Friday, July 7, 2017

डर




मुझे ऊंचाई से कभी डर नही लगा 
तब के अलावा, जब मैंने रोप-वे में
डिब्बेनुमा कोठरी की काँच से
खाई के तल की गहराई देखी

पहले तो मैं सालों तक
उसकी पुरानी चिट्ठियाँ खोल कर पढने से डरती रही
लेकिन फिर एक दिन मैंने
खतों में लिखे शब्द खुरचकर निकाले
उन्हें भिगोकर एक गमले में बो दिया

उनमें अंकुर फूटे
वैजयंती मोती जैसे चमकीले बूटे फले
मैं यह रहस्य समझी
कि शिव के आँसू पेड़ पर कैसे लगते हैं

पनीली चमक लिए
इन मोतियों को कविता में पिरोते
दुःख की अतल खाई को
मैंने आकाश में बदलते देखा

वे चिट्ठियाँ सफ़ेद पंखों की शक़्ल में
मेरे कंधों पर उग आयीं.

फिर कभी मुझे रोप वे की कोठरी से नीचे
खाई का तल देखने पर भय नही महसूस हुआ।

Friday, June 16, 2017

पक्षी, दीमकों और पंखों की कथा.

एक पक्षी था. अपने कुटुंब के साथ आसमानों तक उड़ान भरता हुआ. उसकी नज़र तेज़ थी. वह दूर तक देख लेता था. उसके कान तेज़ थे वह दूर की आवाजें सुन लेता था. एक दिन आसमान में उड़ते हुए उसे एक बैलगाड़ी दिखी. गाड़ीवान ऊँची आवाज में चिल्लाता जा रहा था "दो दीमकें लो, एक पंख दो ". पक्षी को दीमकें बहुत पसंद थी. वे आसानी से नहीं मिलती थी, उनके लिए ज़मीन तक आना पड़ता था. यह बड़ी सुविधा थी कि स्वादिष्ट दीमकें कोई महज़ एक पंख के बदले दे रहा था. पक्षी नीचे आता है. पेड़ की डाल पर बैठता है. गाड़ीवान और पक्षी के बीच सौदा पक्का होता है. हालाँकि अपनी चोंच से एक पर खींच कर तोड़ने में पक्षी को दर्द तो होता है, लेकिन दीमकों का स्वाद उसे यह दर्द भुला देता है.

पक्षी का पिता उसे यह समझाने की कोशिश करता है कि दीमकें हमारा स्वाभाविक आहार नहीं है, और इसके बदले पंख तो हरगिज़ नहीं दिए जा सकते. पक्षी नहीं मनता है. वह हर तीसरे प्रहर आकाश से नीचे धरती में पेड़ की डाल तक आता एक पंख देता, और दो दीमकें ले जाता. दीमकों की लत लग गयी थी उसे.

एक दिन उसने उड़ने की क्षमता खो दी. अब वह सिर्फ दो पेड़ों तक फुदक ही पाता था. लेकिन दीमक बेचने वाले का भरसक इंतजार करता. कभी - कभी गाड़ीवाले को देर हो जाती, कभी वह नहीं भी आता था. पक्षी ने सोचा अब से मैं खुद धरती पर जाकर दीमकें जमा करूंगा . बात की बात में उसने ढेर सारी दीमकें जमा कर लीं. वह खुश हुआ .जब गाड़ीवाला आया पक्षी ने कहा "देख लो, मैंने ढेर सारी दीमकें जमा कर लीं ". गाड़ीवाले को कुछ समझ नहीं आया, "तो ?" उसने पूछा . "मुझसे दीमक लेकर मेरे पंख दे दो" पक्षी ने कहा . अब गाड़ीवाला हंसा, "मैं पंखों के बदले दीमकें देता हूँ. दीमकों के बदले पंख नहीं" गाड़ीवाले ने जवाब दिया और गाड़ी मोड़कर चलता बना.

पक्षी हतप्रभ डाल पर बैठा रह गया. एक दिन बिल्ली आयी और उसे खा गयी.
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कथा "मुक्तिबोध" की है. मैंने संक्षेप में लिखा है. कथा के और कई अर्थ हो सकते हैं लेकिन मुझे न जाने क्यों इस कथा में हर बार एक स्त्री का अस्तित्व दीखता है.


प्रेम हो या जीवन पंख न खोने दीजिए, पंख आसानी से नहीं उगते.

Tuesday, May 30, 2017

जंगल




बेतरतीब टहनियों के बीच लटके मकड़ियों के उलझे जाल
आकाश की फुसफुसाहट है जंगल के कानों में
धरती पर बिखरी पेड़ों की उथली उलझी जड़ें
उन फुसफुसाहटों के ठोस जवाब में लगते धरती के कहकहे हैं

आकाश की फुसफुसाहटों में न उलझकर
चालाक मकड़ियाँ उस पर कुनबा संजोती हैं
जो तितलियाँ दूर तक उड़ने के उत्साह में
नज़दीक़ लटके जाले नही देख पाती
वे पंखों से चिपक जाने वाली
लिसलिसी कानाफूसियों से हारकर मर जाती हैं

धरती की हंसी को नियामत समझकर
विनम्र छोटे कीट वहां अपनी विरासत बोते हैं
लेकिन उन अड़ियल बरसिंघों को  सींग फंसा कर मरना पड़ता हैं
जो हंसी के ढाँचे को अनदेखा करते हैं
(2)

स्मृतियों से हम उतने ही परिचित होते हैं
जितना अपने सबसे गहरे प्रेम की अनुभूतियों से
पौधे धूप देखकर अपनी शाखाओं की दिशा तय कर लेते हैं
प्रेम के समर्थन के लिए सुदूर अतीत में कहीं स्मृतियाँ
अपनी तहों में वाज़िब हेर - फेर कर लेती हैं

हम प्रेम करते हैं या स्मृतियाँ बनाते हैं
यह बड़ा उलझा सवाल है
तभी तो हम केवल उनसे प्रेम करते हैं
जिनकी स्मृतियाँ हमारे पास पहले से होती है
या जिनके साथ हम आसानी से स्मृतियाँ बना सकें

(3)

जाता हुआ सूरज सब कलरवों की पीठ पर छुरा घोंप जाता है
गोधूलि की बेला आसमान में बिखरा दिवस का रक्त अगर शाम है
तो रौशनी की मूर्च्छा को लोग रात कहते हैं

जब वह उनींदी लाल आँखें खोलता मैं उसे सुबह कहती थी
जब अनमनापन उसकी गहरी काली आँखों के तले से
नक्षत्र भरे आकाश तक फैलता मेरी रात होती थी

(4)

टहनियों के बीच टंगे मकड़ियों के जालों के
बीच की खाली जगह से जंगल की आँखें मुझे घूरती है
मेरे कन्धों के रोम किसी अशरीरी की उपस्थिति से
चिहुँककर बार - बार पीछे देखते हैं

उन्हें शांत रहने को कहती मैं खुद कभी पीछे मुड़ कर नहीं  देखती
ऐसे मुझे हमेशा यह लगता रहता है कि वह मुझसे कुछ ही दूर
बस वहीं खड़ा है जहाँ मैंने अंतिम दफ़ा उसे विदा कहा था  

प्रेम में उसका मेरे पास न होना
कभी उसकी उपस्थिति का विलोम नही हो पाया
मुझे लौटते देखती उसकी नज़र को
मैं अब भी आँचल और केशों के साथ कन्धों  से लिपटा पाती हूँ

(5)

हरे लहलहाते जंगलों में लाल - भूरी धरती फोड़कर
उग आये सफ़ेद बूटे जैसे मशरूम उठाती मैं सोचती हूँ कि ये  
 मकड़ी के सघन जालों के बीच की खाली जगह से गिर गए
 जंगल के नेत्र गोलक है

जंगल हमेशा मुझे अविश्वास से देखता है
जैसे वह मेरा छूट गया आदिम प्रेमी है 
जो अधिकार न रखते हुए भी यह जरूर जानना चाहता है
कि इन दिनों मैं क्या कर रही हूँ

अविश्वाशों के जंगल में मैंने उसे हमेशा
लौट आने के भरोसे के साथ खोया था
वह मेरे पास से हमेशा न लौटने के भरोसे के साथ गया
(6)

मेघों की साज़िश भरी गुफ्तगू को बारिश कहेंगे
तो सब दामिनीयों  को आकाश में चिपकी  जोंक मान लेना पड़ेगा
उन्होंने सूरज का खून चूसा तभी तो उनमें  प्रकाश है

आसमान के सब चमकीले सूरजों को चाहिए कि वे स्याह ईर्ष्यालु मेघों से बच कर चलें
मेघों के पास सूरज की रौशनी चूस कर चमकने वाली जोंकों की फ़ौज होती हैं
जो उनका साथ देने को रह - रह कर अपनी नुकीली धारदार हंसी माँजती है  

कुछ लोग दामिनीयों जैसे चमकते हुए उत्साह से तुम्हारे जीवन में आएंगे
स्याह मेघों की फ़ौज़ के हरकारे बनकर
तुम दिखावटी चमक के इन शातिर नुमाइंदों से बचना
ये थोड़े समय तक झूठे उत्साह के भुलावे देकर
तुम्हारे भीतर की सब रौशनी चूस लेंगे.

(वसुधा - ९९ में प्रकाशित )

Monday, February 13, 2017

प्रेम गीत


एक अकेली कुर्सी में तुम्हारी जांघों पर
कोमलता से थमी रहती हूँ मैं
जैसे मकड़ी के जाले पर ओस की बूँदे थमी रहती हैं

उज़बक नामों की पंखुड़ियाँ हैं
जो अंजुली भर - भर कर तुम मुझपर
लाड़ में न्योछावर करते हो

जिस भाषा में तुम मेरे लिए गीत लिखते हो
उसका लहजा आंसू धुले गालों जितना कोमल है

तुम्हारी बाँहों की सिरहनी तक मैं
नर्म नींद की तलाश में पहुचती हूँ                        
उनींदी बरौनियां तुम्हारे दिल के
ठीक ऊपर दस्तक देती है
तुम्हारे ह्रदय की सांकल बजा कर मैं
मीलों तक चले घायल सैनिक की तरह
वहीँ ढेर हो जाती हूँ

तुम्हारे सवालों के जवाब
मेरे थके होठों तक कभी नही पहुँच पाते 

तुम जो हिदायते देते हो उन्हें मैं
मीठे सपनों के अधबुने दृश्यों में दोहराती हूँ

नींद की रातों में तुम्हारे सीने में
छुपा रहता है मेरा आधा चेहरा
मैं जानती हूँ एक दिन जब मैं जागूंगी
खाट की रस्सी से नंगी पीठ पर बने निशानों की तरह  
मेरे चेहरे पर तुम्हारे दिल में छिपे सब दुःख छपे मिलेंगे

हजारों साल बाद एक दिन जब पुरात्ववेता
तुम्हारी पसलियाँ ख़ुदाई से निकालेंगे
तब वहां चारो तरफ मेरी उँगलियों से बुना संगीत गूँजेगा

एक दिन शिकायत की थी तुमने
तुम मुझे पत्थर की दिवार क्यों कहती हो?
सुनो कि अक्सर मुझे लगता है
मैं गर्वीली शेरनी हूं तुम पत्थर की वह गुफा
जिसमे मेरे सपनों के भित्तिचित्र अंकित है

तुम्हारी देह मेरा वह घर है
जहां मैं झांझ - पानी से
बचने के लिए शरण लेती हूं

मेरी नींद का भरोसा हो तुम
मैं तुम्हारी रगों में बहते खून की सुगबुगाहट हूं
जब मैं यह लिख रही हूँ, तब मैं जानती हूँ
कि घोंसले भी चिड़ियों के लौट आने की
प्रतीक्षा करते हैं

तुम चाँदनी में स्थिर सोता तालाब हो 
तुम्हारी देह मेरी अनियंत्रित साँसों की 
कारीगरी से बने  
सिहरनों के वलय - वस्त्र धारण करती है 

अनखुली कलियों की नाज़ुक चुभन का
शोर है तुम्हारी उँगलियाँ
जिनकी नोक से मेरी त्वचा पर तुम
सुगंधों के झालरदार गोदने उकेरते हो 

पांत में सटकर लगे असंख्य बारहसिंगे
तुम्हारी पलकों के कोरों पर झुककर
अपनी प्यास बुझाते हैं

अँधेरी झुरमुट की तरफ सावधान होकर
भागते शंकालु खरगोश की तरह
रौशनी, तुम्हारी काली आँखों तक भागकर जाती है
वह भी जानती है  कि तुम घर हो उसका
तुम्हारे भीतर समो कर वह खुद को बचा लेगी
बिलकुल मेरी ही तरह

नसों में चाबुक की तेज़ी से लपकता है रक्त
कामना के मारीच  देह पर
मुक्ति की आस लिए चौकड़ी भरते हैं
मेरी हथेलियों पर उगे ग्रहों का जाल
तुम्हारी देह की नखरीली कांपों का भविष्य रचता है  

मुझे पत्थर होने की शिक्षा मिली थी
तुम्हे प्यार करने के लिए मुझे हवा होना पड़ा
मैंने जाना जुड़े रहना सही तरीक़ा है
लेकिन समस्या से नही समाधान से

तुम्हे बता सकूं कि कितनी निर्दोष है तुम्हारी आँखें
इसलिए मैंने उन छतों को देखा जिनमे गुम्बद नही थे

तुम हो तो तुम्हारे होने की कई अनुवाद हैं
तुम हो जो मेरे अंदर कविता बनकर उगते हो
तुम हो जो मेरे भीतर अवसाद की धुंधलाती शाम बनकर डूबते हो
तुम ही हो जिसकी बाहों की गर्माहट से
मेरी दुनिया की सबसे गुनगुनी सुबहें उपजती हैं

तुम्हारा प्यार मेरे जीवन का सबसे मासूम स्वार्थ है
तुम्हारे होने का मतलब मुंडेर पर टिकी
भूरी गौरय्या का जोड़ा है
जो फुरसत में एक दूसरे का सिर खुजाते हैं

सुनो, मेरे पास बैठ जाओ और मुस्कराओ
यकीन मानो सिर्फ ऐसे ही मैं
दुनिया की सबसे सुन्दर कविता लिख सकती हूँ

मुस्कराओ कि अब भी बाकी है सर्दियों की कई रातें
जो कतई मेरा नुकसान करने की कुव्वत रखती हैं.

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