Tuesday, October 15, 2019

गांधी की आत्मकथा पर मेरे विचार


गांधी की आत्मकथा अर्थात सत्य के प्रयोग में गाँधी ने अधिकतर अपने बचपन और उसके बाद युवास्था के दौरान दक्षिण अफ्रीका के जीवन और सेवा का विवरण लिखा है. वे यह भी लिखते हैं कि वे चाहते हैं आने वाले समय में युवा और सेवाधर्मी लोग इस किताब से सिखने लायक बातें सीखें.
गौर से देखा जाए तो यह एक महात्मा की जीवन – गाथा नहीं है. यह एक बालक की कथा है जो राजा हरिश्चंद्र की कथा से प्रभावित होकर सत्यवादी और श्रवन कुमार की कथा से प्रभावित होकर पितृभक्त बनना चाहता है. यह  मनुष्य के रूप में अपनी विषयासक्ति से लड़ते हुए एक युवक की कथा है. एक ईर्ष्यालु पति की कथा है जो अपनी पत्नी के चरित्र को लेकर लगातार संदेह करता रहता है. एक किशोर की कथा है जो फारसी की कक्षा में सिर्फ इसलिए जाकर बैठ जाता है कि उसके शिक्षक संस्कृत के शिक्षक से अधिक नरमदिल होते हैं.
किशोर गांधी एक अन्य बिगडैल किशोर से सिर्फ इसलिए मित्रता कर लेते हैं कि वह उन्हें सुधारना चाहते हैं. कोई और होता तो बात सिर्फ इतनी ही रहती. लेकिन यह गाँधी हैं जो उस दुर्घटना से सबक लेकर हमे चेताते हैं कि “सुधार करने के लिए मनुष्य को गहरे पानी नहीं पैठना चाहिए, जिसे सुधारना है उसके साथ मित्रता नहीं हो सकती. मित्रता सामान गुणों वालों के बीच शोभती और निभती है ”
किशोर गांधी चलन और आधुनिकता के प्रभाव में आकर मांसाहार का प्रयोग करते हैं. जबकि वे कट्टर वैष्णव परिवार से ताल्लुक रखते थे. गाँधी ने इसे भटकाव माना है. लेकिन मुझे लगता है कि अधिकतर किशोरों में यह प्रयोगवृति होती ही है. अगर आपका मन बंधनों से मुक्त है और आप ऐसे माहौल में हैं जहाँ पारिवारिक परम्परराओं से परे कुछ घटित हो रहा है जो किसी कारन आपको गलत नहीं लगता, तो उस ओर आकर्षित होना एक सामान्य मानवीय गुण है. यह मांसाहार की आदत बाद में गांधी सिर्फ इसलिए छोड़ देते हैं कि उन्हें माता – पिता और परिवार से इस बाबत झूठ बोलना और छिपाना ठीक नहीं लगता.
ऐसे ही एक और प्रसंग में गाँधी वेश्यागमन पर अपने अनुभव लिखते हैं, जहाँ वे विधाता कि कृपा से) वे यह पाप करने से बच जाते हैं. मुझे लगता है इसमें विधाता की कृपा कम उनका अपना निर्णय अधिक था. स्त्रिओं की तरह पुरुषों पर कई भी कई तरह के सामाजिक दबाव होते हैं. जिसमे से एक बड़ा दबाव होता है अपना पुरुषत्व साबित करना. गाँधी भी कम – ओ – बेश इसी का शिकार होते हैं, लेकिन वेश्या से अपशब्द सुनकर वापिस हो लेते हैं. और यह पाप कर्म करने से बच जाते हैं ऐसा उन्होंने लिखा है. मानने को हम मान सकते हैं यह गाँधी कि अन्तश चेतना थी जिसने उन्हें इस कृत्य से बचाया.
किशोर गांधी धूम्रपान करने की आदत भी पाल लेते हैं, उसके लिए रुपये भी चुराते हैं. इस लत को पूरा करने में खुद को असमर्थ पाने से उनका ह्रदय दुखता है और वे धतूरे के  बीज खाकर प्राण त्यागने का निश्चय करते हैं. जो वे नहीं कर पाते, और वे इससे बेहतर मार्ग का चयन करते हैं वे पिता से जाकर चोरी कि बात स्वीकार कर लेते हैं और दंड पाने की कामना करते हैं. पिता खुद अश्रु बहाते सो जाते हैं, इस घटना से गाँधी को जीवन में अहिंसा और प्रेम के सम्बन्ध का पहला पाठ हासिल होता है.
गाँधी बाद में जोर देकर एक बात कहते हैं वह यह कि विद्यालय का कार्य सिर्फ किताबी शिक्षा देना नहीं होना चाहिए. वे कहते हैं बालकों को धर्म के बिषय में ज्ञान मिलना चाहिए. इस धर्म का अर्थ यहाँ आत्मबोध या आत्मज्ञान देने से है. वे चाहते हैं कि धर्म के उदार स्वरुप का ज्ञान बालकों को स्कूली शिक्षा के साथ ही दिया जाए. इससे उनके चरित्र निर्माण में सहायता मिलती है.
किशोर गांधी को इसाई धर्म से अरुचि थी. क्योंकि इसाई धर्म प्रचारक हिन्दू धर्म की बुराई करते थे, और उनके बारे में यह बात फैली हुई थी कि वे गोमांस और शराब की वकालत करते हैं. गांधी मनुस्मृति भी पढ़ते हैं लेकिन मनुस्मृति पढ़कर उनके मन में धर्म के प्रति श्रद्धा की जगह नास्तिकता की भावना ही अधिक पैदा होती है. समझने को हम इसी एक बात से गाँधी के लिए धर्म के अर्थ को समझ सकते हैं. गाँधी के लिए वह धर्म कोई मानी नहीं रखता था जिसमे अहिंसा का आभाव हो.
युवा गाँधी पढाई के लिए समुद्र पार जाते हैं. गाँधी को भाषा, पहनावे और रहन – सहन की दिक्कत आती है वे इन सब से पार पाकर अपनी पढाई पूरी करते हैं. लेकिन गाँधी ने शुरूआती दौर में सभ्य अंग्रेजी समाज को प्रभावित करने के लिए अपनी वेशभूषा ठीक करने के जो उपक्रम पुस्तक में लिखें हैं वे बड़े रोचक हैं. 
गांधी एक लज्जाशील युवक थे. वे सार्वजनिक भाषण करने में असमर्थता का अनुभव करते थे. वे विदेश में अन्नाहारियो की सभा के मुख्य सदस्य थे लेकिन कभी उन्होंने अधिकार पूर्वक अपनी बात सभा के समक्ष नहीं रखी. वे शुरूआती दौर में कुशल वक्ता नहीं थे. मैं समझती हूँ जब तक आपको अपनी सही युद्ध भूमि नहीं मिल जाती कोई यह जान नहीं सकता कि वह कैसा योद्धा है. गांधी की युद्ध भूमि मानव मात्र के हितों की रक्षा थी. और जब यह मौका उनके सामने आया तो वे बोले भी और लडे भी . सब ने उनकी नेतृत्व क्षमता देखी. संसार ने देखा एक मनुष्य के पीछे कैसे एक पूरा देश चलता है.
गाँधी ने जोर देकर कहा है किसी भी सत्य के पुजारी के लिए मौन और मितभाषी होने को साधना अत्यंत आवश्यक है. इससे मनुष्य सबकुछ बोल देने की अधीरता से मुक्त होकर परिपक्व  होने की तरफ बढ़ता है.
गाँधी ने इस समय इसाई धर्म के एक नए रूप को भी जाना उन्हें ईसा के प्रवचन बहुत भाए. उन्होंने गीता, बुद्ध वचन और ईसा के वचनों को मिलकर अपने जीवन का नया दर्शन गढ़ा. जो बाद के समय में उन्हें बल और दिशा देता रहा.
गांधी देश लौटते हैं फिर रोजगार के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका जाते हैं. वहां उन्हें कुली बैरिस्टर कहा जाता है. ट्रेन में पहले दरजे से उतर कर तीसरे दरजे में जाने को कहा जाता है. वे तीसरे दरजे में जाने से इंकार करके ट्रेन छोड़ देते हैं. वेटिंग रूम में बैठे – बैठे हिन्दुस्तानियों की दशा पर विचार करते हैं और अपने अधिकारों के लिए लड़ने का निश्चय करते हैं. यहाँ से गांधी का जीवन अलग हो जाता है. यह उस मार्ग की शुरुआत होती है जिस मार्ग पर चलकर गांधी हमारे सामने महात्मा बनकर खड़े होते हैं.  वे देश लौटते हैं और यहाँ की समस्याओं से जूझते हुए सेवा को ही अपना धर्म मानकर भारतीय राजनीती के महानायक बनकर उभरते हैं.
गाँधी के मन और दर्शन का स्वरुप जानने के लिए उनके जीवन को देखना ही एकमात्र सही तरीका है. गाँधी जिन विचारों के लिए मृत्यु को आलिंगन करने को तैयार थे वह विचार ही गाँधीवाद का आधार - स्वरुप है. और वह विचार था मनुष्य के प्रति मनुष्य के सम्मान का , अहिंसा, सेवाभाव , आत्मबोध और सम्प्रद्यिक एकता का.
गाँधी धर्म के नाम पर बहुसंख्यक वाद को रियायत देने के खिलाफ थे. लेकिन वह हिन्दू धर्म में उपस्थित एक सुन्दर अवधारणा की बात करते थे. यह विचार था मनुष्य के जागृत आत्मन का विचार. वे मानते थे कि भौतिक साधनों को प्राप्त करने की होड़ में मनुष्य को अपने अध्यात्मिक विकास को अनदेखा नहीं करना चाहिए.
हम किसी भी धर्म के हों हमें अपने धर्मों में बताये गए सद्गुणों को आत्मसात करके एक साधारण मनुष्य से उच्चतर मनुष्य बनने की ओर निरंतर गति करनी चाहिए.   
गाँधी कहते थे पाकिस्तान की परीक्षा इससे होगी कि वे अपने अपनों से कैसा व्यवहार करते हैं. क्योकि शिया सुन्नी आदि भेद तो मुस्लिमों में भी हैं. यानि वे अपने अल्प्सख्यकों से कैसा व्यवहार करते हैं इसके आधार पर देश के रूप में उनकी सफलता या असफलता का पता लगाया जा सकता है.
आज के दौर में हम जिस कुव्यवस्था में सांस लेने को मजबूर हैं हमें बार बार अपने गिरेबान में झाँक  कर यह देखना चाहिए कि हम जातीय या सांस्कृतिक रूप से कितने सभ्य हैं. अल्पसंख्यक समुदायों से कैसा व्यवहार करते हैं? क्या हममे जागृत अवचेतन है ? क्या हमने अहिंसा सत्य और दया के भाव को अपने मन में स्थान दिया है.
हम जानते हैं इन सभी प्रश्नों का उत्तर हाँ नहीं है, और हमें तब तक प्रयास करते रहना होगा जब तक कि इन सवालों के जवाब में हम हाँ, नहीं कह पाते.  
और तब तक हमें गांधी को एक दिये की तरह सामने रखना होगा जिसके प्रकाश में हम अपने मन के अन्न से दूषित कंकर पत्थर निकाल सकें. अपने मन के भावों को समाज के सामने परोसने जितना साफ़ कर सकें.