Monday, February 13, 2017

प्रेम गीत


एक अकेली कुर्सी में तुम्हारी जांघों पर
कोमलता से थमी रहती हूँ मैं
जैसे मकड़ी के जाले पर ओस की बूँदे थमी रहती हैं

उज़बक नामों की पंखुड़ियाँ हैं
जो अंजुली भर - भर कर तुम मुझपर
लाड़ में न्योछावर करते हो

जिस भाषा में तुम मेरे लिए गीत लिखते हो
उसका लहज़ा आंसू धुले गालों जितना कोमल है

तुम्हारी बाँहों की सिरहनी तक मैं
नर्म नींद की तलाश में पहुचती हूँ                        
उनींदी बरौनियां तुम्हारे दिल के
ठीक ऊपर दस्तक देती है
तुम्हारे ह्रदय की सांकल बजा कर मैं
मीलों तक चले घायल सैनिक की तरह
वहीँ ढेर हो जाती हूँ

तुम्हारे सवालों के जवाब
मेरे थके होठों तक कभी नही पहुँच पाते 

तुम जो हिदायते देते हो उन्हें मैं
मीठे सपनों के अधबुने दृश्यों में दोहराती हूँ

नींद की रातों में तुम्हारे सीने में
छुपा रहता है मेरा आधा चेहरा
मैं जानती हूँ एक दिन जब मैं जागूंगी
खाट की रस्सी से नंगी पीठ पर बने निशानों की तरह  
मेरे चेहरे पर तुम्हारे दिल में छिपे सब दुःख छपे मिलेंगे

हजारों साल बाद एक दिन जब पुरात्ववेता
तुम्हारी पसलियाँ ख़ुदाई से निकालेंगे
तब वहां चारो तरफ मेरी उँगलियों से बुना संगीत गूँजेगा

एक दिन शिकायत की थी तुमने
तुम मुझे पत्थर की दिवार क्यों कहती हो?
सुनो कि अक्सर मुझे लगता है
मैं गर्वीली शेरनी हूं तुम पत्थर की वह गुफा
जिसमे मेरे सपनों के भित्तिचित्र अंकित है

तुम्हारी देह मेरा वह घर है
जहां मैं झांझ - पानी से
बचने के लिए शरण लेती हूं

मेरी नींद का भरोसा हो तुम
मैं तुम्हारी रगों में बहते खून की सुगबुगाहट हूं
जब मैं यह लिख रही हूँ, तब मैं जानती हूँ
कि घोंसले भी चिड़ियों के लौट आने की
प्रतीक्षा करते हैं

तुम चाँदनी में स्थिर सोता तालाब हो 
तुम्हारी देह मेरी अनियंत्रित साँसों की 
कारीगरी से बने  
सिहरनों के वलय - वस्त्र धारण करती है 

अनखुली कलियों की नाज़ुक चुभन का
शोर है तुम्हारी उँगलियाँ
जिनकी नोक से मेरी त्वचा पर तुम
सुगंधों के झालरदार गोदने उकेरते हो 

पांत में सटकर लगे असंख्य बारहसिंगे
तुम्हारी पलकों के कोरों पर झुककर
अपनी प्यास बुझाते हैं

अँधेरी झुरमुट की तरफ सावधान होकर
भागते शंकालु खरगोश की तरह
रौशनी, तुम्हारी काली आँखों तक भागकर जाती है
वह भी जानती है  कि तुम घर हो उसका
तुम्हारे भीतर समो कर वह खुद को बचा लेगी
बिलकुल मेरी ही तरह

नसों में चाबुक की तेज़ी से लपकता है रक्त
कामना के मारीच  देह पर
मुक्ति की आस लिए चौकड़ी भरते हैं
मेरी हथेलियों पर उगे ग्रहों का जाल
तुम्हारी देह की नखरीली कांपों का भविष्य रचता है  

मुझे पत्थर होने की शिक्षा मिली थी
तुम्हे प्यार करने के लिए मुझे हवा होना पड़ा
मैंने जाना जुड़े रहना सही तरीक़ा है
लेकिन समस्या से नही समाधान से

तुम्हे बता सकूं कि कितनी निर्दोष है तुम्हारी आँखें
इसलिए मैंने उन छतों को देखा जिनमे गुम्बद नही थे

तुम हो तो तुम्हारे होने की कई अनुवाद हैं
तुम हो तो दुःख हैं
तुम हो तो सुख हैं
तुम हो जो मेरे अंदर कविता बनकर उगते हो
तुम हो जो मेरे भीतर अवसाद की धुंधलाती शाम बनकर डूबते हो
तुम ही हो जिसकी बाहों की गर्माहट से
मेरी दुनिया की सबसे गुनगुनी सुबहें उपजती हैं

तुम्हारा प्यार मेरे जीवन का सबसे मासूम स्वार्थ है
तुम्हारे होने का मतलब मुंडेर पर टिकी
भूरी गौरय्या का जोड़ा है
जो फुरसत में एक दूसरे का सिर खुजाते हैं

सुनो, मेरे पास बैठ जाओ और मुस्कराओ
यकीन मानो सिर्फ ऐसे ही मैं
दुनिया की सबसे सुन्दर कविता लिख सकती हूँ

मुस्कराओ कि अब भी बाकी है सर्दियों की कई रातें
जो कतई मेरा नुकसान करने की कुव्वत रखती हैं.

***



Tuesday, January 10, 2017

कायरता का गीत.

यों तो सब जीतना ही सीखते हैं
लेकिन तुम हारना भी सीखना
जब कोई कहे रूकना या जाना तुम्हारा फैसला है
तब तुम खुद से हार कर रुक जाना

याद रखना कोई प्रतीक्षा करे
तो लौट कर ना आने के लिए तुम स्वतंत्र नही
तुम्हारी आवक पर किसी की राह देखती
नज़र की रौनक उधार है

कोई भोजन बनाए तो भूखे रह जाने के लिए
तुम स्वतंत्र नहीं तुम्हारी ज़िद से दबा दी गई भूख पर
किसी के हाथों में बसने वाले स्वाद की तृप्ति उधार है

कोई फटे चिथड़े देखकर तुम्हारे लिए गर्म पंखों का लबादा बुने
तो ठंढ में मर जाने के लिए तुम स्वतंत्र नही
तुम्हारी ठंडी होती देह पर किसी के स्पर्श का ताप उधार है

रोकना अपने उस अहम को जो हार जाने के आड़े आता है
सीखना कैसे अंगुलिमाल की आँखों की लाल आग हार जाती है
तथागत की निर्दोष आँखों की पनीली करुणा से
समझो कि इसमें सिर्फ बुद्ध की तो करामात नहीं थी

तुम ऐसे हारना कि मन लबालब भरा लगे
उस घड़े की तरह जो पानी की मुसलसल धार से
हार कर अंततः भर जाता है
फिर किसी प्यासे के तृप्त हो जाने तक
इंतज़ार करता है फिर से हराए जाने के लिए

गर तुम्हें टूटना पड़े तो ऐसे टूटना
जैसे बेहद पका मीठा फल टूटता है टहनी से
उसका हर बीज धरती की देह को छूकर
नया पौधा बन जाने की इच्छा करता है
फिर से जन्म लेकर असंख्य बार टूटने के लिए

जब तुम खत्म होना तो उस सुन्दर कविता की तरह
जो हर बार अलग कविता का बीज बनकर फूटती है
सुदूर देश के किसी अनजान पढने वाले के मन में
नए रूप में फिर से अपने लिखे जाने के लिए

ऐसे बिखरना जैसे खेत बोने के लिए किसान
मुट्ठी भरकर बीज बिखेरता है
लहलहाती फ़सल की कल्पना में वह खुद हरा हो जाता है
तुम फ़सल की आशा में उसका हरा होता चेहरा देखना
इस तरह बिखेरे जाने के लिए तैयार होना

जबकि सनकी रणबांकुरों के ज़ालिम हाथ
दुनिया की रुपहली सिवन उधेड़ेंगे
हराए जाने के अफ़सोस को एक तरफ करके तुम
प्रेम की छोटी सी सूई से दुनिया के टुकड़े रफ़ू करना

जब कोई भूख से सूखकर मुरझाए शरीर में भोजन की तरह रिसे
सफ़ेद हथेलियों में ख़ून की गुलाबी आभा की जगह भर जाए
तब आत्मा के सोख्ते से प्रेम सोखने के लिए
उसकी बगल में निश्चेष्ट करवट सोना.


(हंस के जनवरी 2017 अंक में प्रकाशित )

Thursday, November 17, 2016

वह ..

तस्वीर - साभार गूगल.



उसकी मुस्कराहट परतदार समुद्री लहरों जैसी थी
होंठों के कोर से खुद को छुआ कर लौटती
आवाजाही का वह खेल खेलती
जो बिल्लियाँ अपने मालिकों से खेलती है

जब वह भरपूर पुलक से मुस्कुराता था
उसकी नाक के दोनों तरफ गालों की पेशियां ऐसे उमगती थीं
जैसे उड़ने से ठीक पहले पक्षी डैने फुलकाते हैं

हरे बाँस की बाँसुरी से नवयौवना दुर्गा
आश्विन की हवा के सुर फूंकती सी लगती थी
जब सफ़ेद फूली कांसी के कुंज उसकी हंसी में लहलहाते थे

मैं ज़रा सी फूँक मार कर अगर उड़ा देती
उसके चेहरे से अवसाद की स्याह राख
तो नारंगी लपटों का सधा हुआ नृत्य थी उसकी हँसी

उसका मन हरा था, मन के घाव भी हरे थे
एक हरापन उसकी देह में भी था, वह सिहरता था
देह में सरसों की पीली बाड़ी फूटती थी

उसका मेरे साथ होना दरवाजे के दो पल्लों का साथ होना था
एक दूसरे की उँगलियों में फंसी उँगलियाँ हलके से छोड़कर
हम अपने बीच से लोगों को आवाजाही करने देते थे

उसका मेरे साथ होना द्वार के दोनों ओर लगे
सजावटी अशोक के हमउम्र पेड़ों का होना साथ था
जिनपर झांझ, बरसात वसंत सब एक जैसे असर करते थे

उसका मेरा साथ होना मोम और उसकी बाती का साथ होना था
वह तिल - तिल जलाता था, रौशनी फैलाने के नियम से बंधी
मेरी काँपती सी सांसों की लौ उसके साथ ही मिटती जाती थी

उसने ऐसे समेटा था अपने मन में मेरा प्रेम
जैसे वृंत से गिर जाने से पहले अंतिम दफा फूल
अपनी पंखुड़ियां समेटता है.


 (समावर्तन" अक्तूबर 2016 अंक में प्रकाशित )

Friday, October 14, 2016

अभिप्रेत कथा


पेंटिंग - Sean Yoro.


मैं पानी में तैर सकने वाली एक बड़ी पोत थी एक नाविक मेरा प्रेमी था।  मुझे याद है जब वह मेरे पास पहली बार आया था उत्साह से छलछलाता नौजवान था। उसके सर में समुद्री बाज़ के पर का हैट था। उसके पैरों में नाविकों जैसे ही चमड़े के मजबूत जूते थे। मैं भी तब चमकती भव्य नाव थी। भव्यता कई बार निस्तब्धता से भर देती है। भव्यता संक्रमित भी करती है ऊँचे पहाड़ उंचाई के अकेलेपन से आक्रांत करके आपको स्थिर कर देते हैं।  श्मशान अपनी नीरवता, अपनी मनहूसियत का कुछ हिस्सा आपको निराशा के रूप में सौंप देता है। चंचल नदियाँ आपके अंतर में तरल कुछ छेड़ जाती हैं। भव्य ईमारतें आपमें संभ्रात और पुरातन स्मृतियाँ जीवित कर देती हैं। असीम समुद्र आपको गहरे चिंतन में धकेल देता है और आकाश का विस्तार आप में शून्य भर देता है। यह सब भव्यताएँ हैं , संक्रमित करने वाली भव्यताएं। आप में खुद को भरने वाली भव्यताएं। वह नाविक भी मेरी  सुरचित ग्रहणीय भव्यता से आकर्षित हुआ और मुझे लेकर तरलता के साम्राज्य में फिरने लगा। मन्वंतर बीते, कल्प बीते एक दिन मुझे मुसलसल तैरने से थकावट होने लगी मेरा नाविक भी पानी के असीम विस्तार पर भटकते - भटकते थक गया था। मेरी आँखें लगातार कई साल सूरज की रौशनी का सामना करते - करते चौंधियाने लगी थीं। मेरे विशाल पाल जो उत्साही पक्षी के पंखों जैसे दिखते थे, फट गए थे। देह जर्जर हो गई थी। वह भी मुक्त होना चाहता था, मैं भी निर्वाण पाना चाहती थी। लेकिन हमारे पास कुछ भय थे

मेरे नाविक को उन राजाओं से भय होता था जो नाविकों से सफर की कहानियाँ सुनकर मनोरंजन करते हैं। जिन्हें  हर कथा में चमत्कार चाहिए होता है. हर बात में मनुष्य की अदम्य  जिजीविषा के आश्चर्यजनक किस्से चाहिए होते हैं। हमें उनसे भय होता था जो हर  तरह की साधारणता के खिलाफ थे. जिनके पास हर चीज के लिए एक "उपयोग" था। मुझे सागर किनारे की शुष्क रेत में धंसे रहकर अपनी भव्यता का क्षरण देखते रहने से भय होता था।  फिर मुझे संग्रहालय में नमूने की तरह रखे जाने से भय होता था। लोग मेरी भव्यता के उदाहरण देते, मुझे काँच के बाहर से नाक गड़ा कर निहारते। मुझे इस निरीह -पने से भय होता था। इससे बेहतर होता वे मुझे ईंधन समझकर आग में झोंक देते, लेकिन समाज को युवावस्था की उपयोगिता को बुढ़ापे में संग्रहणीय प्रतीक  भर बना देने  के कई षड़यंत्र आते हैं

मैंने अपने नाविक से कहा कि वह मेरे हृदय के तल को निशाना बनाकर एक तीर छोड़े, मैं इस सागर में ही डूब जाना चाहती हूँ। तीर निशाने पर लगा. मेरे ह्रदय से समुद्र का नमकीन रक्त बलबला कर बाहर आया।  मैं समझ नहीं सकी कि मेरे कष्ट से समुद्र की छाती फट गई या मेरे दुःख पर बिलखते समुद्र उसके अश्रु ही मेरे रक्तबिंदु थे साथ रहते शायद मेरी धमनियों में उसका खून बहने लगा था। अंतर्मुखी लोगों की अश्रुधार भी अन्तः सलिला होती है, समुद्र से अधिक अंतर्मुखी और कौन हो सकता था। तल पर हुए छेद से मैं डूब गई। मैंने समुद्र तल में समाधि ले ली और मेरे नाविक को लहरों ने किसी तट पर उलीच दिया।  वह दुर्घटना से स्मृतिहीन हो गया और बहकर वहां पहुँचा जिस द्वीप में कोई उसे मेरे साथ जोड़कर नही देखता। अब वह अपनी पहचान खोकर निरुद्देश्य भटकता है। अब भी कुछ खोजी तैराक वहां आते हैं , जहाँ समुद्र तल में मैं समाधिस्थ हूँ।  वे सब कोई छिपा खज़ाना ढूँढने आते हैं, और निराश होकर लौट जाते हैं। समुद्र किनारे की रेत की शुष्कता कई नाविकों की स्मृतिहीनता है जो उत्साह भटक जाते हैं, वे स्मृतिहीन हो जाते हैं जो भव्यताएँ डूब गई हो, ज़रूरी नहीं कि उनके पास हमेशा कोई छिपा ख़जाना हो ही।