Friday, September 8, 2017

कुछ नयी कविताएं



इधर इंटरनेट पर कुछ नयी कविताएं लगायी गयी हैं. उन्हें  आप यहाँ नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.


कविता कोश में मेरी कविताएं .

समालोचन ब्लॉग में.


इन दिनों कई कामों में एक साथ व्यस्त हूँ. लेकिन फिर भी बीच - बीच में ब्लॉग अपडेट करती रहूंगी.

Wednesday, September 6, 2017

एक लम्बी कविता.


A still from movie "Antichrist"

मेरे मैं के बारे में


मुझे थोड़ा - थोड़ा सब चाहते थे
ज़रूरत के हिसाब से कम - बेशी
सबने मुझे अपने पास रखा
जो हिस्सा लोग गैर ज़रूरी समझ कर अलगाते रहे
मेरा “मैं” वहाँ आकार लेता था
आखिर जो हिस्सा खर्चने से बाक़ी रह जाता है
वही हमारी बचत है

मुझ पर अभियोग लगे,
जाने वालों को रोकने के लिए
मैंने आवाज़ नहीं लगायी

मन मौन का एक भंवर है
      जिसमे कई पुकारें दुःख के घूँट पीती
कलशी की तरह डूब जाती हैं

मैंने कभी किसी से नहीं कहा
कि जो कविताएं मैंने काग़ज पर नहीं लिखी
उनकी परछाईयां मेरे अन्दर 
निशा संगीत की धुन पर
दिए की कांपती लौ की मानिंद नृत्य करती हैं

रात के तीसरे पहर मेरी कविताओं की परछाई
दुनिया के सफ़र पर निकलती है
उन परछाइयों से मिलने
जिन्हें अपने होने के लिए
रौशनी की मेहरबानी नहीं पसंद

कुछ पुकारें हैं मेरे पास जो सिर्फ अँधेरी रातों के
घने सन्नाटे में मुझे सुनायी देती हैं

कुछ धुनें हैं जो सिर्फ तब गूंजती हैं
जब मेरे पास कोई साज़ नहीं होता

कविता की कुछ नृशंस पंक्तियाँ हैं
जो उस वक़्त मेरा मुँह चिढ़ाती हैं
जब मेरे पास उन्हें नोट करने के लिए वक़्त नहीं होता

कुछ सपने हैं जो रोज चोला बदल कर
मुझे मृत्यु की तरफ ले जाते हैं
अंत में नींद हमेशा मरने से पहले टूट जाती है

जिस समय लोग मुझे चटकीली सुबहों में ढूंढ रहे थे
मैं अवसादी शामों के हाथ धरोहर थी

क्या यह इस दुनिया की सबसे बड़ी विडम्बना नहीं है
कि रौशनी की हद अँधेरा तय करता है ?

रौशनी को जीने और बढ़ने के लिए
हर पल अँधेरे से लड़ना पड़ता है

मैं लड़ाकू नहीं हूँ , मैं जीना चाहती हूँ
अजीब बात है, सब कहते हैं
यह स्त्री तो हमेशा लड़ती ही रहती है

मैं खुद पर फेंके गए पत्थर जमा करती हूँ
कुछ को बोती हूँ, पत्थर के बगीचे पर
पत्थर की चारदीवारी बनाती हूँ

उन्हें इस आशा में सींचती हूँ
किसी दिन उन में कोपलें फूटेंगी
हंसिये मत, मैं पागल नहीं हूँ

हमारे यहाँ पत्थर औरतों और भगवान
तक में बदल जाते हैं
मैंने तो बस कुछ कोपलों की उम्मीद की है

अपने होने में मैं अपने नाम की गलत वर्तनी हूँ
मेरा अर्थ चाहे तब भी मुझ तक पहुँच नहीं सकता
उसे मुझ तक ले कर आने वाला नक़्शा ही ग़लत है

दुनिया के तमाम चलते - फिरते नाम
ऐसे ग़लत नक़्शे हैं जो अपने लक्ष्यों से
बेईमानी करने के अलावा
कुछ नहीं जानते

जवाबों ने मुझे इतना छला
कि एक दिन मैंने सवाल पूछना छोड़ दिया

मैं नहीं हो पायी इतनी कुशाग्र
कि किसी बात का सटीक जवाब दे सकूँ
इस तरह मैं न सवालों के काम की रही
न जवाबों ने मुझे पसन्द किया

अलग बात है शब्द ढूंढते ढूंढते,
मैंने इतना जान लिया कि
परिभाषाओं में अगर दुरुस्ती की गुंजाईश बची रहे
तो वे अधिक सटीक हो जाती हैं

कुछ खास  गीतों से मैं अपने प्रेमियों को याद रखती हूँ
प्रेमियों के नाम से उनके शहरों को याद रखती हूँ

शहरों की बुनावट से उनके इतिहास को याद रखती हूँ
इतिहास से आदमियत के जय के पाठ को

मेरी कमज़ोर स्मृति को मात देने का
मेरे पास यही एकमात्र तरीक़ा है

भूलना सीखना बेशक जीवन का सबसे ज़रूरी कौशल है
लेकिन यह पाठ हमेशा उपयोगी हो यह ज़रूरी नहीं है

मन एक बैडरूम के फ़्लैट का वह कमरा है
जिसमें जीवन के लिए ज़रूरी सब सामान है
बस उनके पाए जाने की कोई माकूल जगह नहीं है

आप ही बताएँ वक़्त पर कोई सामान ना मिले
तो उसके होने का क्या फ़ायदा है ?

मेरे पास कुछ सवाल हैं जिन्हें कविता में पिरो कर
मैं दुनिया के ऐसे लोगों को देना चाहती हूँ,
जिनका दावा है कि वे बहुत से सवालों के जवाब जानते हैं

जैसे जब तबलची की चोट पड़ती होगी तबले पर
तब क्या पीठ सहलाती होगी मरे पशु की आत्मा ?

जिन पेड़ों को कागज हो जाने का दंड मिला
उन्हें कैसे लगते होंगे खुद पर लिखे शब्दों के अर्थ ?

वे बीज कैसे रौशनी को अच्छा मान लें ?
जिनका तेल निकाल कर दिए जलाये गए,
जबकि उन्हें मिट्टी के गर्भ का अंधकार चाहिए था
अंकुर बनकर उगने के लिए

एक सुबह जब मैं उठी
तो मैंने पाया प्रेम और सुख की सब सांत्वनाएं
मरी गौरैयों की शक्ल में पूरी सड़क पर बिखरी पड़ीं हैं

इसमें मेरा दोष नहीं था मुझे कम नींद आती है
इसलिए मैं कभी नींद की अनदेखी न कर पायी
मेरी नींदों ने हमेशा आसन्न आँधियों की अनदेखी की

इस क़दर धीमी हूँ मैं कि रफ़्तार का कसैला धुआँ
मेरी काया के भीतर उमसाई धुंध की तरह घुमड़ता है

कुछ अवसरवादी दीमकें हैं जो मन के अँधेरे कोनों से
कालिख़ मुँह में दबाये निकलती हैं

ये शातिर दीमकें मेरी त्वचा की सतह के नीचे
अँधेरे की लहरदार टहनियाँ गुंथतीं हैं

देह की अंदरुनी दीवारों पर अवसाद की कालिख़ से बना
अँधेरे का निसंध झुरमुट आबाद है

चमत्कार यह हैं कि काजल की कोठरी में
विराजती है एक बेदाग़ धवल छाया
जो लगातार मेरी आत्मा होने का दावा करती है

कई लोग मेरे बारे में इतना सारा सच कहना चाहते थे
कि सबने आधा - आधा झूठ कहा

अक्सर ऐसे अगोरती हूँ जीवन
जैसे राह चलते कोई ज़रा देर के लिए
सामान सम्हालने की जिम्मेदारी दे गया हो

एक दिन अपने बिस्तर पर
ऐसा सोना चाहती हूँ कि मैं उसे जीवित लगूं 
एक दिन शहर की सडकों पर
बिना देह घूमना चाहती हूँ.

दुःखों की उपज हूँ मैं
इसलिए उनसे कहो, मुझे नष्ट करने का ख़्वाब भुला दें
पानी में भले ही प्रकृति से उपजी हर चीज सड़ जाये
काई नही सड़ती.

***



(पूर्वग्रह -१५६  में प्रकाशित )

Sunday, July 23, 2017

बतकही

सुनो,
मुझे चूमते हुए तुम
हाँ तुम ही

मान सको तो मानना प्रेम वह सबसे बड़ा प्रायश्चित है
जो मैं तुम्हारे प्रति किये गए अपराधों का कर सकती हूँ

मेरा तुमसे प्रेम
मेरी देह के अब मेरे पास
"न होने" का प्रायश्चित है

**

सुनो,
नखरीली शिकायतों वाले तुम

बहुत बदमाश पीपल का घना पेड़ हो तुम
छाँव में बैठी जोगनियों को छेड़ने के लिए
पहले उनपर अपने पत्ते गिराते हो

फिर अकबका कर जागते हो
जोगनियों के सर
पतझड़ लाने का ठीकरा फोड़ते हो

**

सुनो,
देर रातों को बिना वजह झगड़ने वाले तुम

तुमने क्यों कहा
तुम एक रोतलू बीमार तनावग्रस्त बुढ़िया की आत्मा हो
जिसके पास बैठो तो वह जिंदगी भर मिले दुःखों का गाना गाने लगती है

जैसे हम देना पसंद करते थे
पूरे वाक्य के बजाय चंद शब्दों में
मैंने दिया जवाब "तुम भी "

फिर हम लंबे समय तक साथ बैठकर रोये
फिर हँसे, अपने लिए किसी नए को ढूंढ लेने का ताना दिया
और एक - दूसरे को रोतलू कहा

**

सुनो,
दुनिया की सबसे मासूम नींद सोने वाले तुम

मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया
कि जब मुझे लगता है मैं हार जाऊँगी 
खुद से
ज़माने से
ज़िन्दगी की दुरभिसंधियों से
मैं अपनी स्टडी टेबल से उठकर
तुम्हारा नींद में डूबा चेहरा देखती हूँ

तुम्हारी पतली त्वचा के अंदर बह रहे खून का रंग
कंठ के पास  उँचक - बैठ रही तुम्हारी श्वासों की आवृत्ति
मुझसे मुस्कुरा कर कहती है तुम ऐसे नहीं हार सकती
कि हमने वादा किया था
हम साथ रहेंगे सुख में नहीं तो न सही
लेकिन अपने और सबके लिए की गई सुख की आशा में

**
सुनो,
महँगी दाल और सब्जी के दौर में
भात और आलू खाकर मोटे होते तुम

जिस क्षण प्रेम में चमत्कार न उत्पन्न हो सके
तुम अंतरालों पर भरोसा रखना
तुम्हें प्रतीक्षाएँ मेरे पास लेकर आएँगी
होगी कोई बेवजह सी लगने वाली बेवकूफी भरी बात
जो स्मृति बनकर तुम्हारे मन को अकेलेपन में गुदगुदाएगी

कर सको तो बस इतना सा उपकार करना प्रेम पर
अपने अहम् के महल में प्रेम को कभी ईंटों की जगह मत आँकना
मेरे नेह पगे शब्दों को कुर्ते पर तमगे की तरह मत टाँकना

**

सुनो,
रसीली बातों और गाढ़ी मीठी
मुस्कान वाले तुम

तुम एक बड़ा सा पका रसभरा चीकू हो
इसे ऐसे भी कह सकते हैं

तुम्हारे अंदर बहुत सारे पके रसभरे चीकू भरे हैं
जो मेरी ओर देख - देख कर मुस्कराते हैं

सुनो ज़रा कम - कम मुस्कुराया करो
ज़ोर से चोंच मारने वाली चिड़ियों को
थोड़ा कम -ज़ियादा लुभाया करो  

**
सुनो,
गर्वीले और तुनकमिजाज़ मन वाले तुम


हमेशा कुछ बातें याद रखना
जिन्होंने तुम्हारी देह पर चुभोये होंगे
लपलपाते चाकू और बरछियाँ
वे तुम्हारी सुघडता की नेकनामी लेने आएंगे

जिन्होंने तुम पर तेज़ाब उड़ेला होगा
वे तुम्हारी जिजीविषा के
परीक्षक होने का ख़िताब पाएंगे

जिन्होंने शाख से काट कर
तुम्हें कीचड़ में फेंक दिया होगा
तुम्हारे वहां जड़ जमा लेने पर
वे तुम्हारे पोषक माली कहलायेंगे

उनसे बचना जो बहुत तारीफ़ या अतिशय निंदा करें
पुरानी पहचान की किरचें निकाल कर
वर्तमान में इंसान को शर्मिंदा करना
कुंठित लोगों का प्रिय शगल है

**

सुनो
आधी उम्र बीत जाने के बाद
ज़रा शातिर ज़रा लापरवाह हुए तुम
हाँ तुम ही

जाने कैसे पढ़ लेते हो तुम मेरा मन
कि अब नाराज़ होकर उठकर जाना चाहती हूँ मैं
और उठने से ठीक पहले तुम मेरा हाथ पकड़ लेते हो 

प्रेम में लंबे समय तक होना शातिर बना देता है 
जबकि प्रेम के स्थायित्व पर विश्वास होना
प्रेमी को लापरवाह बनाता है

**

सुनो
लंबी अंतरालों तक गुम हो जाने वाले तुम

यह न सोचा करो कि मेरा प्रेम
तुम्हारे सर्वश्रष्ठ होने का प्रतिफल है
यह तुम्हें प्रेम करते हुए
तुम में सर्वश्रेष्ठ पाने का संबल है

**
सुनो
कड़वी और जली - भुनी बातों वाले तुम
हाँ कि बस तुम ही

कोई गुण तो हरी घाँस की नोक का भी होगा
वरना चुभते नुकीलेपन के माथे
ऐसे कैसे जमी रह जाती मुझ सी तरल
ओस की नाज़ुक़ बूँद.
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