Friday, June 16, 2017

पक्षी, दीमकों और पंखों की कथा.

एक पक्षी था. अपने कुटुंब के साथ आसमानों तक उड़ान भरता हुआ. उसकी नज़र तेज़ थी. वह दूर तक देख लेता था. उसके कान तेज़ थे वह दूर की आवाजें सुन लेता था. एक दिन आसमान में उड़ते हुए उसे एक बैलगाड़ी दिखी. गाड़ीवान ऊँची आवाज में चिल्लाता जा रहा था "दो दीमकें लो, एक पंख दो ". पक्षी को दीमकें बहुत पसंद थी. वे आसानी से नहीं मिलती थी, उनके लिए ज़मीन तक आना पड़ता था. यह बड़ी सुविधा थी कि स्वादिष्ट दीमकें कोई महज़ एक पंख के बदले दे रहा था. पक्षी नीचे आता है. पेड़ की डाल पर बैठता है. गाड़ीवान और पक्षी के बीच सौदा पक्का होता है. हालाँकि अपनी चोंच से एक पर खींच कर तोड़ने में पक्षी को दर्द तो होता है, लेकिन दीमकों का स्वाद उसे यह दर्द भुला देता है.

पक्षी का पिता उसे यह समझाने की कोशिश करता है कि दीमकें हमारा स्वाभाविक आहार नहीं है, और इसके बदले पंख तो हरगिज़ नहीं दिए जा सकते. पक्षी नहीं मनता है. वह हर तीसरे प्रहर आकाश से नीचे धरती में पेड़ की डाल तक आता एक पंख देता, और दो दीमकें ले जाता. दीमकों की लत लग गयी थी उसे.

एक दिन उसने उड़ने की क्षमता खो दी. अब वह सिर्फ दो पेड़ों तक फुदक ही पाता था. लेकिन दीमक बेचने वाले का भरसक इंतजार करता. कभी - कभी गाड़ीवाले को देर हो जाती, कभी वह नहीं भी आता था. पक्षी ने सोचा अब से मैं खुद धरती पर जाकर दीमकें जमा करूंगा . बात की बात में उसने ढेर सारी दीमकें जमा कर लीं. वह खुश हुआ .जब गाड़ीवाला आया पक्षी ने कहा "देख लो, मैंने ढेर सारी दीमकें जमा कर लीं ". गाड़ीवाले को कुछ समझ नहीं आया, "तो ?" उसने पूछा . "मुझसे दीमक लेकर मेरे पंख दे दो" पक्षी ने कहा . अब गाड़ीवाला हंसा, "मैं पंखों के बदले दीमकें देता हूँ. दीमकों के बदले पंख नहीं" गाड़ीवाले ने जवाब दिया और गाड़ी मोड़कर चलता बना.

पक्षी हतप्रभ डाल पर बैठा रह गया. एक दिन बिल्ली आयी और उसे खा गयी.
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कथा "मुक्तिबोध" की है. मैंने संक्षेप में लिखा है. कथा के और कई अर्थ हो सकते हैं लेकिन मुझे न जाने क्यों इस कथा में हर बार एक स्त्री का अस्तित्व दीखता है.


प्रेम हो या जीवन पंख न खोने दीजिए, पंख आसानी से नहीं उगते.

Sunday, June 4, 2017

अधूरी नींद का गीत



अधूरी नींद का गीत 


तुम मिलते हो पूछते हो कैसी हो ?
मैं कहती हूँ  “अच्छी हूँ”..

(जबकि जवाब सिर्फ इतना है
जिन रास्तों को नही मिलता उनपर चलने वालों का साथ
उन्हें सूखे पत्ते भी ज़ुर्रत करके दफना देते है

एक दिन इश्क़ में की मांगी गयी तमाम रियायतें
दूर से किसी को मुस्कराते देख सकने तक सीमित हो जाती है
मुश्क़िल यह है, यह इतनी सी बात भी
दुनिया भर के देवताओं मंज़ूर नही होती
इसलिए मैं दुनिया के सब देवताओं से नफरत करती हूँ
 
(देवता सिर्फ स्वर्गी जीव नही होते)

मैं तुम्हारे लौटने की जगह हूँ

(कोई यह न सोचे की जगहें हमेशा
स्थिर और निष्क्रिय ही होती हैं )

प्रेम को जितना समझ सकी मैं ये जाना
प्रेम में कोई भी क्षण विदा का क्षण हो सकता है
किसी भी पल डुबो सकती है धार
अपने ऊपर अठखेलियां करती नाव को

(यह कहकर मैं नाविकों का मनोबल नही तोड़ना चाहती
लेकिन अधिकतर नावों को समुद्र लील जाते हैं )  

जिन्हें समुद्र न डुबोये उन नावों के तख़्ते अंत में बस
चूल्हे की आग बारने के काम आते हैं
पानी की सहेली क्यों चाहेगी ऐसा जीवन
जिसके अंत में आग मिले ?

(समुद्र का तल क्या नावों का निर्वाण नहीं है
जैसे
डूबना या टूटना सिर्फ नकारात्मक शब्द नहीं हैं)

तुम्हारे बिना नही जिया जाता मुझसे
यह वाक्य सिर्फ इसलिए तुमसे कभी कह न सकी मैं
क्योंकि तुम्हारे बिना मैं मर जाती ऐसा नही था

(मुझे हमेशा से लगता है विपिरीतार्थक शब्दों का चलन
शब्दों की स्वतंत्र परिभाषा के खिलाफ एक क़िस्म की साजिश है )

हम इतने भावुक थे की पढ़ सकते थे
एक दूसरे के चेहरे पर किसी बीते प्रेम का दुःख
मौजूदा आकर्षण की लिखावट

 (सवाल सिर्फ इतना था कि
कहाँ से लाती मैं अवसान के दिनों में उठान की लय
कहाँ से लाते तुम चीमड़ हो चुके मन में लोच की वय)

ताज़्ज़ुब है कि न मैं हारती हूँ, न प्रेम हारता है
मुझे विश्वाश है तुम अपने लिए ढूंढ कर लाओगे
फिर से एक दिन छलकती ख़ुशी
मैं तुम्हे खुश देखकर खुश होऊँगी
एक दिन जब तुम उदास होगे
तुम्हारे साथ मुट्ठी भर आँसू रोऊँगी

(हाँ, इन आँसूओं में मेरी भी नाक़ामियों की गंध मिली होगी

लेकिन फ़िलहाल
इन सब बातों से अलग
अभी तुम सो रहे हो

तुम सो रहे हो
जैसे प्रशांत महासागर में
हवाई के द्वीप सोते हैं 
तुम सो रहे हो
लहरों की अनगिनत दानवी दहाड़ों में घिरे शांत
पानी से ढंकी - उघरी देह लिए लेकिन शांत
तुम सो रहे हो
धरती का सब पानी रह - रह उमड़ता है
तुम्हारी देह के कोर छूता है खुद को धोता है
तुमसे कम्पनों का उपहार पाकर लौट जाता है 
तुम सो रहे हो
स्याह बादल तुमपर झुकते, उमड़ते हैं
बरसते हुए ही हारकर दूर चले जाते हैं   
तुम सो रहे हो
सुखद आश्चर्य की तरह शांत
मैं अनावरण की बाट जोहते
रहस्य की तरह अशांत जाग रही हूँ.

Tuesday, May 30, 2017

जंगल




बेतरतीब टहनियों के बीच लटके मकड़ियों के उलझे जाल
आकाश की फुसफुसाहट है जंगल के कानों में
धरती पर बिखरी पेड़ों की उथली उलझी जड़ें
उन फुसफुसाहटों के ठोस जवाब में लगते धरती के कहकहे हैं

आकाश की फुसफुसाहटों में न उलझकर
चालाक मकड़ियाँ उस पर कुनबा संजोती हैं
जो तितलियाँ दूर तक उड़ने के उत्साह में
नज़दीक़ लटके जाले नही देख पाती
वे पंखों से चिपक जाने वाली
लिसलिसी कानाफूसियों से हारकर मर जाती हैं

धरती की हंसी को नियामत समझकर
विनम्र छोटे कीट वहां अपनी विरासत बोते हैं
लेकिन उन अड़ियल बरसिंघों को  सींग फंसा कर मरना पड़ता हैं
जो हंसी के ढाँचे को अनदेखा करते हैं
(2)

स्मृतियों से हम उतने ही परिचित होते हैं
जितना अपने सबसे गहरे प्रेम की अनुभूतियों से
पौधे धूप देखकर अपनी शाखाओं की दिशा तय कर लेते हैं
प्रेम के समर्थन के लिए सुदूर अतीत में कहीं स्मृतियाँ
अपनी तहों में वाज़िब हेर - फेर कर लेती हैं

हम प्रेम करते हैं या स्मृतियाँ बनाते हैं
यह बड़ा उलझा सवाल है
तभी तो हम केवल उनसे प्रेम करते हैं
जिनकी स्मृतियाँ हमारे पास पहले से होती है
या जिनके साथ हम आसानी से स्मृतियाँ बना सकें

(3)

जाता हुआ सूरज सब कलरवों की पीठ पर छुरा घोंप जाता है
गोधूलि की बेला आसमान में बिखरा दिवस का रक्त अगर शाम है
तो रौशनी की मूर्च्छा को लोग रात कहते हैं

जब वह उनींदी लाल आँखें खोलता मैं उसे सुबह कहती थी
जब अनमनापन उसकी गहरी काली आँखों के तले से
नक्षत्र भरे आकाश तक फैलता मेरी रात होती थी

(4)

टहनियों के बीच टंगे मकड़ियों के जालों के
बीच की खाली जगह से जंगल की आँखें मुझे घूरती है
मेरे कन्धों के रोम किसी अशरीरी की उपस्थिति से
चिहुँककर बार - बार पीछे देखते हैं

उन्हें शांत रहने को कहती मैं खुद कभी पीछे मुड़ कर नहीं  देखती
ऐसे मुझे हमेशा यह लगता रहता है कि वह मुझसे कुछ ही दूर
बस वहीं खड़ा है जहाँ मैंने अंतिम दफ़ा उसे विदा कहा था  

प्रेम में उसका मेरे पास न होना
कभी उसकी उपस्थिति का विलोम नही हो पाया
मुझे लौटते देखती उसकी नज़र को
मैं अब भी आँचल और केशों के साथ कन्धों  से लिपटा पाती हूँ

(5)

हरे लहलहाते जंगलों में लाल - भूरी धरती फोड़कर
उग आये सफ़ेद बूटे जैसे मशरूम उठाती मैं सोचती हूँ कि ये  
 मकड़ी के सघन जालों के बीच की खाली जगह से गिर गए
 जंगल के नेत्र गोलक है

जंगल हमेशा मुझे अविश्वास से देखता है
जैसे वह मेरा छूट गया आदिम प्रेमी है 
जो अधिकार न रखते हुए भी यह जरूर जानना चाहता है
कि इन दिनों मैं क्या कर रही हूँ

अविश्वाशों के जंगल में मैंने उसे हमेशा
लौट आने के भरोसे के साथ खोया था
वह मेरे पास से हमेशा न लौटने के भरोसे के साथ गया
(6)

मेघों की साज़िश भरी गुफ्तगू को बारिश कहेंगे
तो सब दामिनीयों  को आकाश में चिपकी  जोंक मान लेना पड़ेगा
उन्होंने सूरज का खून चूसा तभी तो उनमें  प्रकाश है

आसमान के सब चमकीले सूरजों को चाहिए कि वे स्याह ईर्ष्यालु मेघों से बच कर चलें
मेघों के पास सूरज की रौशनी चूस कर चमकने वाली जोंकों की फ़ौज होती हैं
जो उनका साथ देने को रह - रह कर अपनी नुकीली धारदार हंसी माँजती है  

कुछ लोग दामिनीयों जैसे चमकते हुए उत्साह से तुम्हारे जीवन में आएंगे
स्याह मेघों की फ़ौज़ के हरकारे बनकर
तुम दिखावटी चमक के इन शातिर नुमाइंदों से बचना
ये थोड़े समय तक झूठे उत्साह के भुलावे देकर
तुम्हारे भीतर की सब रौशनी चूस लेंगे.

(वसुधा - ९९ में प्रकाशित )