Friday, December 25, 2015

कथावाचक की कथा

अपने प्यारे देश पेरू को भूलने के लिए एक लेखक फिरेंज़ की गलियों में भटकता है, उसे एक चित्र प्रदर्शनी दिखाई पड़ती है. वह जानता है कि अंदर जाना उसे फिर से पेरू की याद दिलाएगा और उसके व्यक्तिगत जीवन को भावनात्मक भँवर में फंसा देगा, फिर भी एक अदृश्य आकर्षण उसे अंदर ले जाता है। वह सारे चित्र देखता है, व्यग्र होता है लेकिन एक चित्र ऐसा है जो उसकी आँखों के आगे एक क्षण के लिए विस्फोट की सी स्थिति उत्पन्न कर  देता है। वह तुरंत वहां बैठे लोगों से चित्र को खरीदने की इच्छा ज़ाहिर करता है लोग कहते हैं यह चित्र बिकाऊ नही है ,  इसे सिर्फ अवलोकनार्थ यहाँ लगाया गया है और जिस फोटोग्राफर ने उसे खींचा था वह अमेज़ान से लौटते वक़्त ही वहां के भयानक मच्छरों द्वारा काटे जाने के फलस्वरूप बुखार से मर गया है। कोई भी बड़ा शोध या महान कला बलिदान माँगती है।



यह लेखक और कोई नही मारिओ वार्गास ल्योसा (Mario Vargas Llosa) है। जिस चित्र ने उसे अतीत में ले जाकर किंकर्तव्यविमूढ़ छोड़ दिया था उनके प्रिय मित्र और कॉलेज सहपाठी "साउल" का है, जिसने अच्छी भली शहरी जिंदगी  और अकादमिक शिक्षा छोड़कर एक आदिवासी यायावर कथावाचक की जिंदगी का संकल्प ले लिया था। कहानी के मूल नायक साउल की बात करें तो कहा जा सकता है जिनका नाता जंगलों - पहाड़ों से रहा है वे जानते हैं कि जंगल आपको जीवन के किसी मोड़ पर नही छोड़ते, आप जहाँ जाएंगे जंगल आपके साथ जायेगा। आप बार - बार उसे छोड़कर आ जाने की विवशता का अनुभव करते हुए उसे हर तरीके से भूलने की अपने मन के उससे लगाव के कारण हुई क्षति को पूरा करने की कोशिश करेंगे पर आप असफल साबित होंगे और जिंदगी भर त्रस्त रहेंगे। यही हाल कथावाचक साउल का भी हुआ था। यह देखने में बड़ा सामान्य लगता है, पर क्या यह इतना ही सामान्य है?



जब सांस्कृतिक स्रोत - साहित्य को संरक्षित करने की बात आती है तो जो शासक की भाषा और उससे जुड़े मिथक होते हैं वे तो संरक्षित कर दिए जाते हैं परन्तु दूसरा पक्ष अनदेखा रह जाता है। यही लगभग विश्व के हर हिस्से में आदिवासी साहित्य और लोक - साहित्य के साथ हुआ है। लोककथाओं को लिखे जाने उन्हें सम्हाल के रखने के संस्थागत प्रयास बहुत कम हुए है। हमारे देश में तो यह गूलर के फूलों को देख पाने जैसी बात है। खैर इसपर अभी अधिक नही लिखूंगी किताब पर लौटती हूँ।  

मूलतः स्पेनिश भाषा में "एल आब्लादोर (El Hablador) "  के नाम से आई यह किताब अंग्रेजी में द स्टोरीटेलर (The Storyteller)  शीर्षक से और हिंदी में संभवतः "क़िस्सागो" शीर्षक से राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है.

यह किताब दो स्तरों में कथा को व्याख्यायित करती चलती है, पहले में लेखक अपनी और अपने मित्र साउल की कथा कहते है दूसरे में वे माचीग्वेंगा आदिवासी कहानियों को मूल कथा में गूंथते चलते हैं.  लेखक आपको जादूगरों - जादूगरनियों, शैतानों, बौनों और भला करने वाली आत्माओं के ऐसे लोक में ले जाते हैं जहाँ आप मंत्रमुग्ध से दर्शक बने सबकुछ अपने सामने घटित होता देखते हैं। .यह अद्भुत किताब है और उससे भी अद्भुत है लेखक की शैली उनका चयन और बात कहने का उनका तरीका।  मैं इसे पढ़े जाने की पुरज़ोर सिफारिश करती हूँ. समयाभाव के कारण बहुत लिख पाना तो अभी मेरे लिए सम्भव नही पर किसी दिन समय मिला तो मैं इस किताब पर अलग से लिखना चाहूंगी। 


- लवली गोस्वामी

Saturday, December 19, 2015

एक कविता, एक लोककथा.

शतकत्रय के महान रचनाकार राजा भृतहरि एक बार शिकार करने जंगल गए. उन्होंने एक काले हिरण का शिकार किया. यह एक मान्यता है कि एक काला हिरण 126 हिरणियों का पति होता है. मरते - मरते हिरन राजा से कहता है - राजन यह तुमने अच्छा नहीं किया, फिर भी अब जबकि मेरी मृत्यु क़रीब है मैं तुमसे अनुरोध करता हूँ कि मेरे सींग श्रृंगी बाबा को, नेत्र चंचल स्त्री को, खाल साधु संतों को, पैर चोरों को और मेरे शरीर की मिट्टी राजा को देने का उपक्रम करो तो मेरी आत्मा को शांति मिले। राजा ने हाँ कहा और हिरण को लादकर लौटने लगा तब उसे गुरु गोरखनाथ मिल गये। आगे की कथा फिर कभी। अभी इतना कि इसी हिरण की कथा पर आधारित मेरी इस बहुत पुरानी कविता का युवा साथियों ने यहाँ नाटकीय रूपांतरण किया था. यह एक संकलन में भी आई थी. नाटकीय प्रस्तुतीकरण का यू - ट्यूब लिंक पोस्ट में नीचे संलग्न है।  प्रस्तुतीकरण बैंगलोर के साहित्यप्रेमी मित्रों सुबोध जी और लक्ष्मी जी के बुकस्टोर आटा - गलत्ता के यूट्यूब चैनल के सौजन्य से साभार लिया गया है .साथ लगाया गया चित्र मित्र दीपशिखा शर्मा द्वारा लिया गया है.




कायांतरण
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याद करती हूँ तुम्हें
जब उदासीनता के दौर धूल के बग़ूलों की तरह गुजरतें हैं
स्मृतियों की किरचें नंगे पैरों में नश्तर सी चुभती हैं
याद करती हूँ और उपसंहार के सभी अनुष्ठान झुठलाता
प्रेम गुजरता है आत्मा से भूकम्प की तरह
अब भी सियासत गर्म तवे सी है
जिसमे नाचती है साम्प्रदायिकता और नफरत की बूँदे
फिर वे बदलती जातीं हैं अफवाहों के धुएं में
दंगों के कोलाहल में

अब भी नाकारा कहे जाने वाले लोगों की जायज – नाजायज औलादें
कुपोषण से फूले पेट लेकर शहरों के मलबे में बसेरा करती हैं
होठों पर आलता पोतती वेश्याएं अभी भी
रोग से बजबजाती देह का कौड़ियों के मोल सौदा करती है
मैं वहां कमनीयता नही देखती
मैं वहां वितृष्णा से भी नही देखती
उनसे उधार लेती हूँ सहने की ताक़त

दुःख की टीस बाँट दी मैंने
प्रेमियों संग भागी उन लड़कियों में
जिन्हे जंगलों से लाकर प्रेमियों ने
मोबाइल के नए मॉडल के लिए शहर में बेंच दिया
उन किशोरियों में जिनके प्रेम के दृश्य
इंटरनेट में पोर्न के नाम पर पाये गए
तिरिस्कार का ताप बाँट दिया उनमे
जो बलात्कृत हुईं अपने पिताओं – दाताओं से
जिनकी योनि में शीशे सभ्यता की रक्षा के नाम पर डलवाये गए

तुम्हे याद करती हूँ कि
दे सकूँ अपनी आँखों का जल थोड़ा – थोड़ा
पानी मर चुकी सब आँखों में
हमारी राहतों के गीत अब
लगभग कोरी थालियों की तृप्ति में गूंजते हैं
देह का लावण्य भर जाता है सभ्यता के सम्मिलित रुदन में
कामना निशंक युवतियों की खिलखिलाहट का रूप ले लेती है

अक्सर याद करती हूँ तुम्हे
सभ्यताओं से चले आ रहे
जिन्दा रह जाने भर के युद्ध के लिए
दुनिया भर के प्रेम के लिए
उजली सुबह के साझा सपने के लिए
फिर मर जाने तक जिन्दा रहने के लिए.
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(मैं नही जानती कविता पढने वाली यह युवा साथी कौन हैं, अगर कोई जानता हो तब उन तक मेरा आभार अवश्य प्रेषित करें। )

- लवली गोस्वामी

Sunday, August 16, 2015

शीत और प्रेम



चित्र - साभार गूगल सर्च.
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मेरे लिए प्रेम मौन के स्नायु में गूंजने वाला अविकल संगीत है
तुम्हारा मौन प्रेम के दस्तावेजों पर तुम्हारे अंगूठे की छाप है

रात का तीसरा प्रहर
कलाओं के संदेशवाहक का प्रहर होता  है 
जब सब दर्पण तुम्हारे चित्र में बदल जाते हैं
मै श्रृंगार छोड़ देती हूँ
जब सुन्दर चित्रों की सब रेखाएं
तुम्हारे माथे की झुरिओं का रूप ले लेती हैं  
मैं उष्ण सपनों के रंगीन ऊन पानी में बहाकर
सर्दी की प्रतीक्षा करती हूँ 

सर्दियाँ यमराज की ऋतु है
सर्दियाँ पार करने के आशीर्वाद हमारी परम्परा हैं
* पश्येम शरदः शतम्
** जीवेम शरदः शतम्
मृत्यु का अर्थ देह से उष्णता का लोप है
तो शीत प्रेम का विलोम है 
अक्सर सर्दियों में बर्फ के फूलों सा खिलता तुम्हारा प्रेम मेरी मृत्यु है

तुम मृत्यु के देवता हो
तुम्हारे कंठ का विष अब तुम्हारे अधरों पर हैं
तुम्हारे बाहुपाश यम के पाश हैं
सर्दिओं में साँस - नली नित संकीर्ण होती जाती है
आओ कि  आलिंगन में भर लो और स्वाँस थम जाये
न हो तो बस इतने धीरे से छू लो होंठ ही
कि प्राणों का अंत हो जाये

तुम मेरी बांसुरी हो
प्रकृतिरूपा दुर्गा की बाँसुरी
तुममे सांसों  से सुर फ़ूँकती मैं
जानकर कितनी अनजान हूँ
छोर तक पहुंचते मेरी यह सुरीली साँस
संहार का निमंत्रण बन जायेगी

 मेरे बालों में झाँकते सफ़ेद रेशम
जब तुम्हारे सीने पर बिखरेंगे
गहरे नील ताल के सफ़ेद राजहंसों में बदल जायेगे
ताल, जिसे नानक ने छड़ी से छू दिया कभी न जमने के लिए
हंस, जो लोककथा में बिछड़ गए कभी न मिलने के लिए
मेरे प्रिय अभागे हरश्रृंगार इसी प्रहर खिलते हैं
सुबह से पहले झरने के लिए
सृष्टि के सब सुन्दर चित्र मेरा - तुम्हारा वियोग हैं

मेरे मोर पँख, कहाँ हो
मेरा जूडा अलंकार विहीन है
मेरी बांसुरी, मेरी सृष्टि लयहीन है.

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# "पश्येम शरदः शतम्" - हम सौ शरदों तक देखें, सौ वर्षों तक हमारे आंखों की ज्योति स्पष्ट बनी रहे.
#" जीवेम शरदः शतम् "  - हम सौ शरदों तक जीवित रहें .

 

Friday, July 31, 2015

प्रतीक्षा



चित्र - साभार गूगल


तुम्हे प्रेम करना लक्ष्य से अधिक खुद को रास्तों में बदलते देखना है
तुम्हारी प्रतीक्षा करना घडी की सुईयों से कालचक्र में बदलते जाना है
फिर भी मैंने तुम्हे एक निमंत्रण पत्र लिखा जिसमे पता नही था
उसे सबसे नाकारा हरकारे को थमा कर मैंने आँखें बंद कर ली 
उस निमंत्रण पत्र में तुम्हारे आने की किस्तें बंद थी

तुम मेरे पास किसी बेकल खोजी की तरह आना
कल्पनाओं को हक़ीक़त में बदलने वाले कीमियागर की शक्ल लिए
हम इतिहास के अधूरे सपने को  उन दराजों में से निकालेंगे
जिसमे गुम कर दी गई सबसे पुराने विद्रोहों की कथा
हम विद्रोहों को डोर खोलकर आज़ाद कर देंगे
कल्पनाओं को भविष्य के सतरंगी चित्र में बदल देंगे
फिर तुम मेरे पास कामकाजी सोमवार की तरह आना 
मैं तुम्हारी उपस्थिति बेतरतीब फाइलों में समेट लूंगी 
जब तुम चले जाओगे किसी अंधियारी रात
खिडकी सी आती तेज़ हवा बिखेर देगी प्रेम के संचिकाओं के सब पन्ने 
उन्हें समेटते मैं रख दूँगी उनपर अनंत प्रतीक्षाओं का पेपरवेट 


तुम गहरी नींद के सबसे उत्ताप स्वपन की तरह आना
स्वपन जो इतना तीक्षण हो कि वितृष्णा की परतें भेद सके
और समयों के अंत तक मैं उनपर शब्दों का चंदन लपेटती रह जाऊं
तुम्हारे स्पर्शों का ताप मध्यम करने के लिए 

किसी दिन तुम मिलना ट्रेन के किसी लम्बे सफ़र में
अनजान  पर अपने से लगते मुसाफिर की तरह
इस दौर में भी जब भरोसे भय बन गए हैं
मैं हिम्मत करके पूछ लूंगी तुमसे कॉफी के लिए 
फिर हम दुनिया के दुःख सुख के जरा से साझेदार बनेंगे
जीवन भर साथ चलने के वादे तो ज़ाया हुए
पर हम किसी सफर में कुछ घंटे साथ चलेंगे

फिर तुम तानाशाहों के मिटने की खुशनुमा खबर की तरह आना
जिससे मजलूमों के सुनहरे कल की कवितायी उजास छिटके
सदियों की चुप्पी तोड़कर तुम्हारे शब्द मैं अपने होठों पर रख लूँ
मेरी मुस्कराहट उसे तराश कर एक उजियारी रक्तिम सुबह में बदल दे
मैं जब अगली बार हँसू तो वे धरती के अंतिम छोर तक बिखर जाएँ

तुम आना ऐसे कि हम पूरा कर सके वह सपना
जिसमे पीस देते हैं हम अपना तन क्रूरताओं की चक्की में
न हम खून से प्रेम पत्र लिखते है न बृहद्कथा
चक्कियों से टपकते अपने रक्त को हम आसमानों में पोत देते हैं
कि उससे  बना सकें एक नवजात सूरज 
जो भेद सके  किलेबंदियों के तमाम अंधियारे

{ यह कविता तीन कविताओं की स्मृति को समर्पित है... जिसमे से पहली तो अमृता प्रीतम की कविता "मैं तुझे फिर मिलूंगी है" .. दूसरी अशोक वाजपेयी की "फिर आऊँगा " और गीत चतुर्वेदी की इस ( यूट्यूब लिंक https://www.youtube.com/watch?v=qnRpyVwTQ9A ) काव्यात्मक अभिव्यक्ति "मैं आऊँगा " की स्मृति को... इसकी उत्पति का श्रेय इन्ही कविताओं को है. }

Monday, July 6, 2015

चीन का प्रेम -उत्सव

आजकल लिखने की इच्छा कम होती है लेकिन फिर भी मैं इस ब्लॉग को कोई सुन्दर शुरुआत देना चाहती थी। पहले मुझे लगा मुझे नेरुदा के जन्मदिन तक रुक जाना चाहिए ...जिससे अपने प्रिय कवि से शुरुआत कर सकूं, पर वही हमेशा वाला रोना, जिसे आप प्रेम करते हैं उसपर लिखना कठिन होता है।  तो लेख अधूरा डायरी में पड़ा है। फिर कुछ और याद आया.. और मैंने सोचा कि काम/लिखना - लिखाना तो चलते रहते हैं पर इसे आज ही आपसे शेअर कर लूँ।

...तो आज सात जुलाई है।  ज़ाहिर हैं हर साल होती है। जैसे भारत में वैसे चीन में भी.. पर चीन में आज उत्सव का दिन है। उत्सव है प्रेम का और इसका नाम है Qixi Festival/ Qiqiao Festival. यह क्या उत्सव है यह जानने के लिए आपको एक कथा सुनाती हूँ। तो आप थोड़ी देर के लिए मुझे भूल जाएँ , और खुद को ठंढ की रात के समय अलाव पर बैठा बालक(बालिका ) समझ लें। :-)

एक समय की बात है. दो प्रेमी थे. युवती का नाम  जिन हू और युवक का नाम था न्यु लंग. यह कथा हान साम्राज्य  समय से प्रचलित मानी जाती है (हालाँकि मैं ऐसा नही मानती, उत्पति और आकाशीय पिंडों से जुडी कथाएं अपेक्षाकृत बहुत पुरातन होती हैं, पर वह फिर कभी  )।  कथा के अनुसार न्यु लंग अनाथ चरवाहा है जो अपने बड़े भाई - बहनों के साथ रहता है। वे लोग उससे हमेशा बुरा व्यवहार करते हैं। ज़िन्हु आकाश के देवता की बेटी है. वह खुद एक देवी है. जिसका काम आकाश के लिए रंगीन बादल बुनना है। एक बार जिन हू अपने दायित्व निभाते मानसिक रूप से थक जाती है और थोड़ा खाली समय व्यतीत करने एवं मनोरंजन हेतु धरती पर भ्रमण करने को उतर आती है।

जिन हू  अपनी सखियों के साथ नदी में नहा रही होती है कि न्यू लंग उधर से गुजरता है।  वह आकाशीय देवियों के चमकीले कपडे उत्सुकता और आश्चर्यवश उठा लेता है।  नदी में क्रीड़ा करके जब चमत्कारी सहेलियाँ थक जातीं है तब वे नदी के पानी से बाहर आती है और अपने कपडे न पाकर परेशान होने लगती हैं.  न्यु लंग छिप कर उन्हें देख रहा होता है। वे देवियाँ कपडे न पाने से तंग आकर घोषणा करती हैं कि जो कोई भी उनके कपडे ले गया है वापस कर दे, वे उसे मुँहमाँगा उपहार देंगी। यह सुनकर चरवाहा ओट से बाहर आता है। वह उन देवियों में से एक जिन हू को देखता है और मुग्ध होकर उसे प्रेम कर बैठता है, वहीँ जिन हू भी चरवाहे के सौंदर्य और यौवन पर मुग्ध हो जाती है।

 देवियाँ अपने कपडे लौटने के लिए उसे शुक्रिया कहतीं हैं और उससे इनाम मांगने को भी कहती हैं. चरवाहा डरते - डरते  कहता है अगर आप देवियाँ मुझसे इतनी ही खुश हैं तो अपनी बहन मुझे पत्नी - स्वरुप इनाम में दे दीजिये। देवियाँ क्योंकि शब्द दे चुकी होतीं हैं उनके पास कोई और चारा नही बचता और वे जिन हु को न्यु लंग के पास छोड़कर आकाश में अवस्थित अपने घर को लौट जाती हैं। जिन हु और न्यु लंग एक दूसरे को पाकर बहुत खुश होते हैं। वे विवाह कर  लेते हैं और उनके दो बच्चे भी होते हैं। आकाश की स्वामिनी (अधिकतर कथाओं में स्त्री (सम्राज्ञी) का जिक्र है ) पहले तो ध्यान नही देती , पर जब जिन हु अपने परिवार में उलझ कर अपने दैवीय कर्म पर ध्यान देना छोड़ देती है तो आकाश के पास बादल कम हो जाते हैं, और धरती का संतुलन बिगड़ने लगता है। तब वे क्रोधित हो जाती हैं।  वे न्यु लंग की अनुपस्थिति में जिन हु को वापस ले जाती हैं। जिन हु अपने दैवीय कर्म और जिम्मेदारी से बंधा होने के कारण न नही कह पाती। वो आकाश की देवी (कई अन्य पाठों में माँ ) के साथ अपने घर लौट जाती है।

 इधर धरती पर न्यु लंग काम से वापस आता है और अपनी प्यारी पत्नी को ढूंढने लगता है।  प्यारी पत्नी को न पाकर वह शोक में रोने लगता है. तब उसका प्यारा बैल जो की खुद एक शापित तारा है उसे यह जानकारी देता है कि उसकी पत्नी को आकाश की स्वामिनी अपने साथ ले गई है और अगर वह अपने बच्चों की माता को वापस चाहता है तो उसे आकाश तक का सफर तय करना होगा। इस सफर के लिए न्यु लंग को चमत्कारी बैल की खाल के लबादा - नुमा पंख बनाने होंगे। उन पंखों की सहायता से वह आकाश तक उड़कर अपनी पत्नी को वापस पा सकेगा।  न्यु लंग ऐसा ही करता है। आकाश की स्वामिनी एक साधारण मनुष्य की इस धृष्टता पर क्रोधित हो जाती है। वह नही चाहती की चरवाहा कभी उसकी पुत्री तक पहुंच पाये , वह गुस्से में अपने बालों से हेयरपिन निकलती है और आकाश को चीर देती है। दोनों प्रेमी आकाश के दोनों किनारों पर खड़े रह जाते हैं और उनके मध्य आकाश -गंगा बह निकलती है। दोनों अश्रुओं में टूट जाते हैं। देवी का गुस्सा शांत होता है और वह उन्हें पुरे वर्ष में एक दिन मिलने का समय देने का फैसला करती है। आकाश की स्वामिनी के निर्णयानुसार वे दोनों साल के सातवें  महीने की सातवीं तारीख को मिल सकते हैं। यही दिन चीन में प्रेम का उत्सव है। प्रतीक्षा उन्हें तारों में बदल देती है। आसमान के दो सबसे चमकीले तारों में। युवती श्रवण (ऐल्टेयर) और युवक अभिजित ( वेगा).   वे आज मिलते हैं एक आकाशीय पुल के सहारे। इस कथा के कई वर्जंस हैं। इसपर मैंने एक कविता भी लिखी है और कुछ व्याख्याएँ भी जो पुरातन दस्तावेजों के कहीं दफन होंगी।   कुछ में एक जादुई कोहड़े का भी जिक्र हैं, वह वर्जन सबसे रेयर और मार्मिक है, पर लम्बा है तो वह सब फिर कभी।


 (चित्र - साभार विकिपीडिया )

लोककथाएं , एक अभिन्न सांस्कृतिक अवयव है।  जिनमे सभ्यता के शैशव काल के बीज छुपे होते हैं कैसे/क्यों यह भी फिर कभी... अभी तो शाम आप आकाश देखिएगा क्योंकि इस मौसम में शाम के आकाश में सफ़ेद पक्षी उड़ते हैं, ये एक सीधी रेखा में उड़ने वाले सफ़ेद पक्षी होते हैं , जिन्हे चीन - निवासी आकाश- गंगा में बना पुल मानते हैं, वो पुल जिससे वे प्रेमी मिलेंगे आज। हम खुशनसीब हैं कि magpie की कुछ प्रजातियाँ भारत में भी पाई जाती हैं। मैंने पिछले सालों में उन्हें पुल बनाते देखा है। आप उन्हें देखें, फिर मिलते हैं... अगली बार किसी और कथा के साथ , तब तक के लिए... विदा ।

- लवली गोस्वामी