Monday, October 9, 2017

पक्ष



मेरे आसपास परछाइयों की एक फौज चलती है
जिससे उजाले में रहने वाले भाग्यशाली लोग असहज होते हैं
जिन्हें खुश रहने से अलग कुछ पसंद नहीं  है
वे मुझसे पूरी शिद्दत से नफ़रत करते हैं

मेरी पूरी ताक़त आशाओं के साथ खड़ी हैं
लेकिन उतनी ही ताक़त से मेरी जड़ें
 
दुनियाभर के दुःखों से साथ जुडी हैं

मैं सुखान्त कहानियों के उत्सवों में
शोक की अनंतिम गाथाओं के अधूरे प्लॉट लिए घूमती हूँ
लोगों की चमकीली नज़रें मुझपर पड़ते ही
छायाओं के वश में आकर चितकोबरी हो जाती हैं

मैं दूध में गिरा नमक हूँ
सुवासित भात खाते वक़्त दांतों के बीच आया कंकर हूँ
हर शक़्ल में काले - सफ़ेद के वर्गीकरण का विरोध करता धूसर मिश्रण हूँ
मैं तर्क़ और संवेदना के सदियों से चले  आ रहे द्वंद्व का उलझा हुआ दर्शन हूँ

मैंने सबसे कमज़ोर कराह को सुनने के लिए
बीच महफ़िल में पुरजोर झनकती वीणा के तार पकड़े 
मैं सुरों की अपराधी मानी गयी

मैंने पाप के रंग को चुटकियों में मसलकर देखा
पुण्य की बहुमूल्य गठरियाँ
डगमगाती नौका बचाने के लिए पानी में बहा दी
मैं पुण्य और उपयोगिता की एक बराबर हँसी उड़ाती हूँ
यह कतई मेरी मासूमियत नहीं मेरी दुष्टता है

मेरी दुष्टता है कि मैं  निष्पक्ष नहीं हूँ
मेरी दुष्टता है कि जिस दुनिया में “अजीब” और “बुरा” लगभग समानार्थी है
मैं दोनों को  अलग परिभाषा देने के पक्ष में हूँ

साथी कवियों की तरह
मैंने कभी कविता के भविष्य की चिंता नहीं की
मुझे पता है जब तक दुःख और आशाएँ  रहेंगी,
कविता भी रहेगी

हाँ रहेगी कविता, दुःखों की ज़र्ज़र कथरी में
आशा के वफ़ादार पैबंद की तरह
तकलीफों की भीषण झांझ  बरसात में
कमज़ोर लेकिन जी - जान लगाकर लड़ती
छतरी के साथ की तरह

दुनिया में कविता तब तक रहेगी
जब तक दुनिया में दुःख रहेंगे.



(नया ज्ञानोदय के अक्टूबर २०१७ अंक में प्रकाशित )

No comments:

Post a Comment