Sunday, December 17, 2017

मील का पत्थर है रात.



झींगुरों की लय पर जुगनू तारों की तरह टिमटिमाते हैं
मन मरे परिंदे के मानिंद टहनियों के कुचक्र में फंसा है

बेहद कोमल क्षणों की आवाजें धरोहर होती हैं
ध्वनियाँ स्वाद पैदा करती हैं कई बार.

भुलायी गयी सब कहानियाँ एक रात
झुण्ड बनाकर ओस से केश धोने निकलती है

छूना भी कभी- कभी सहा नहीं जाता
नवजात शिशु के केशों सा कोमल है प्रेम

देह की अलगनी से गीले कपडे की तरह
अस्थि-आँते फिसल कर गिर गए

इन्द्रधनुष के लच्छे भरे हैं अंतड़ियों की जगह
अस्थियों की जगह गीतों की सुनहरी पंक्तियाँ रखी हैं.

कलियाँ पौधों की बंद मुठ्ठियाँ हैं
रौशनी नहीं मानती, वह रोज़ आती है

एक दिन कलियाँ बंद मुठ्ठी खोलकर
रौशनी से हाथ मिलाती है.

आँधियों के बाद टूटी टहनियों में
दिवंगत चिड़ियों की फड़फड़ाहटों से भरीं होती हैं
सुन लिया जाना, आवाजों की मृत्यु नहीं है

चकाचौंध से डरी मैं तुम्हे हर जगह ढूंढती हूँ
मन जानता है सिर्फ हिलोरें लेता पानी ही पैदा कर सकता है
चमचमाती रौशनी में झुर्रियाँ.

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